Sunday, January 24, 2010

अपनी कहानी - अपनी जबानी

आदरणीय भाईसाहब
सादर चरण स्पर्श

आपसे विनम्र निवेदन है कि आप हम लोगों को सदा ऎसे ही प्रेरित करते रहें - आज आंख में आंसू तो शायद सूख चुके है पर मन फिर भी रो रहा है - हम कितने बेबस या लाचार है इसका सही अनुमान लगाना मेरे बस के बाहर की बात है, क्यों कहीं कोई बुद्ध नानक या कोई अन्य अवतारी पुरुष इस गरीबी, भुखमरी, फकीरी या बेबसी से हमें क्यों नही निजात दिला सकता । प्रश्न साधारण होते हुये भी उत्तरहीन है - एक छोटी सि कविता आपके भावों से प्रेरित होकर लिखी है - नही, नही, मै तो इस विषय में अपने मन की कह ही नही सकता या कहने से क्या लाभ, कभी कोई कदम इस दिशा में अत्यधिक चाहते हुये भी कभी नही उठा पाया हूं - अपने इन भाई-बहनों से सहानुभूति होते हुये भी कभी भी ऎसा कोई भी कार्य नही किया है कि कभी अपनी पीठ भी थपथपा सकूं (भी का आधिक्य जानबूझकर किया है अपनी असमर्थता पर बल देने के लिये) - चलिये कविता प्रस्तुत है अगर कहीं कोई त्रुटि हो तो अपना अनुज मान कर माफ कर दीजियेगा –

जीवन-परिचय

होश मेरे उड़ गये
अल्फाज़ भी थे खो गये
जब देखता हूं यह गरीबी
या कहूं इतनी फकीरी
उनकी हालत पर तरस खाता नही
अपनी हालत पर बरस पाता कहीं
क्या कर सकूंगा कुछ कभी
जो कुछ न कर पाया अभी
आज मेरी आंख में आंसू नही
दिल भी रोता है कहूं मैं क्या नही
तन पे कपड़ा ही नही
न मन में उनके है खुशी
बस जी रहे है जिंदगी सब
है अजब सी, इस जहां की बेबसी
न इन्होने सुख को जाना
न ही जाना कोई सपना
बस जहां जिस हाल में है
भाग्य अपना उसको माना
न कोई उमंग छूती
न तरंग ही है उठती
जी रहे है जिंदगी को
जैसी उनकी जिंदगी थी
आज मिलकर मन मसोसा
अपने दिल को भी टटोला
हैं क्या यही जीवन के मानी
अपने मन में फिर ये ठानी
कर भला होगा भला
हर शख्स सोचे तो जरा
आज जब उनसे मिला
अपने से भी थी एक गिला
कुछ समय के ही लिये
या कुछ पलों के वास्ते
सोचता हूं जब पलटकर
या देखता मुहं मोड़कर
क्यों खुदा ने खेल इनके साथ खेला
क्यों बंद करके रास्ते
क्या यही जीवन है या फिर
एक यही सच जिंदगी के मायने ।


अभय शर्मा
25 जनवरी 2010

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